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Sunday, September 4, 2011

कोई तो हो अपना

कभी कभी ऐसा क्यों होता है 
की जो बातें बनी बनाई है
वही झूठी साबित हो जाती है
लोग कहते है जिस चीज़ के पीछे भागो
वोह तुम्हे कभी नहीं मिलती
जब भागना छोड़ दो
तो वोह खुद बखुद तुमरे पास चली आती है
लकिन उसके साथ तो ऐसा भी नहीं हुआ
माँ के गुजरने के बाद प्यार को तरसता एक बच्चा
मिली तो हमदर्दी , वोह भी झूठी 
जब बड़ा हुआ तोह दोस्तों में प्यार तलाशने लगा
भाग रहा था प्यार के पीछे , पर कहीं नहीं मिला
जब वोह आई उसकी जिन्दगी में 
तो  लगा जैसे तलाश पूरी हो गई
पर वो नहीं जानता था , बनी बनाई बातो को
प्यार तो उसके नसीब में ही नहीं था 
आज भागना छोड़ दिया उसने प्यार के पीछे 
लकिन वो बातें अभी भी सच नहीं हुई 
इस जिन्दगी में कोई तो हो अपना
जिसे वो  अपना बस अपना कह सके  

4 comments:

रचना दीक्षित said...

ye to jivan ka katu stya hai

vipin sethi said...

thx rachna jee

देवेन्द्र पाण्डेय said...

आपके ब्लॉग की ढेर सारी कविताएं पढ़ीं। यह अधिक अच्छी लगी। जन्म से लेकर मृत्यु तक हम प्यार की तलाश में भटकते रहते हैं, प्यार मिलता नहीं। मिलता भी है तो लगता है यह तो वैसा नहीं है जैसा चाहा था। यह हसरत कभी पूरी नहीं होने वाली। चाहत कभी कम नहीं होने वाली। इससे मुक्ति का एकमात्र रास्ता है कि हम सभी से प्यार करना शुरू कर दें। उसे माफ कर दें जिसने धोखा दिया।

vipin sethi said...

शुक्रिया देवेन्द्र जी. ब्लॉग की गलत सेट्टिंग की वजह से में आपका कमेन्ट पड़ नहीं पाया था आज पड़ कर अच लगा . धोखा तो कोई किसी को नहीं देता बस आपने आप को देता है.. बस कभी मन उदास हो जाता है तो कुछ लिख देता हु