soch

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Wednesday, September 14, 2011

अभी तक हारा नहीं हु मैं





लगा कर आग जो हाथ सेकते है
कभी इधर  की तो कभी उधर  की फेकते है 
नजर नहीं आयेगे जब होगा सामना 
कर दूंगा हषर वो की  मुश्किल हो जायेगा पहचानना 
मासूम दिलो  के जज्बातों से खेलना 
पड़ेगा बहुत महंगा उन्हें
बहुत रुलाया , तडपाया , मजबूर किया है हमे 
जूठी तोहमते , इल्जाम बहुत सहे है हमने 
हँसी आते है सोच कर , क्या होगा उन जालिमो का
जब आपनी पर आएगा कोई 
मेरी हस्ती तो तुम मिटा न सके 
आएगा मजा जब तुमारी हस्ती मिटाएगा कोई  
क्योकि खेल अभी ख़तम नहीं हुआ
अभी तक हारा नहीं हु मैं 

2 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

यह आक्रोश अच्छा लगा।

vipin sethi said...

शुक्रिया देवेन्द्र जी